बहु नहीं इन्हें दहेज़ चाहिए।
किसी की बेटी के बदले इन्हें कार कुर्शी और मेज चाहिए।।
जब धूम धाम से ब्याह कर के लाते है।
तो फिर क्यों दहेज़ के लिए उन्हें तड़पाते है।।
घर का सुख नहीं बल्कि इन्हें पैसों की भूख मिटानी है।
दहेज़ के नाम पर हर बार बहु ही क्यों मारी जानी है।।
दहेज़ देकर रोता है लड़की का परिवार।
वास्तव में क्यों खुश् नही इतना दहेज़ लेकर लड़के का परिवार।।
इन्हें कौन समझाए बहु सुख समृद्धि का द्वार है।
क्यों करते है लोग दहेज़ के नाम पे अत्याचार।।
इन्हें कोई समझाए की बहु के बिना नहीं चल सकता किसी का घर परिवार।
याद रखना दहेज़ लेने वालो बहु ही है घर का सँसार बेटी सामान करो उसको प्यार उसको प्यार।।
दो गज की ज़मीं थी कफ़न था तिरंगा।। आँखों में नमी थी ,छाती था खून से रंगा।। हार जीत की न कोई वजह बाकि थी,न था कोई पंगा।। न बाकि था निपटाने के लिए कोई दंगा।। शहीद का साथ जुड़ा , मिल गया साहस का चमन। लौट के न आया फिर मैं, तो रूठ गया ये वतन।। खून बहा कर लिया जो पाकिसातनियो ने मज़ा।। आत्मा मेरी पूछ रही किस बात की मिली मुझे सजा।। न मैंने किसी का भाई मारा न किसी का बेटा।। फिर भी क्यों रो रहा फफक फफक कर मेरा बेटा।। मुझे कुछ नहीं एक जवाब चाहिए।। इस सोई हुई सरकार से एक हिसाब चाहिए।। कौन लौटायगा मेरे परिवार को बीते हुए कल ।। कौन संवरेगा मेरे परिवार का आने वाला कल।। मुझे कुछ नहीं मुझे इन्साफ चाहिए।। बस मेरी मौत का मुझे इन्साफ चाहिए।।अमित पटेल
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