चलने चले थे खाव्बो की दुनिया में
मंजिल हमारा बसेरा था।।
चारो तरफ एक अजीब सा अहसास था
हर कोई उजाले की तलास में था।।
न साथ दिया किसी ने
फिर भी मैं आगे बढ़ा
न रुका न थका।।।
आई मुश्किल एक बार हँस दिया
बिना तेरे मजिल भी बेकार है
मेहनत बिना कठिनाई धूल सामान है
भीड़ भरे इस संसार में।
खाव्ब कही मेरे गुम से हो गए
पागलो की तरह ढूंढ़ा
आखिर में पता चला।।
मंजिल तो कब की मिल चुकी
बस अब न रुकना न थकना बस
आगे बढ़ना है आगे बढ़ना है।।
यहाँ मैनपाठ की वादिया है। तो जतमई की पहाड़िया है।। बड़े बड़े भैंसे है। तो कही फूलो के उद्यान है।। कभी अनोखे प्रवासी पंछियो का घर है। तो कही नागलोक में साँपो का बसेरा है।। यहाँ बस्तर का दसहरा है। तो वही लाइवलीहुड कॉलज में सुनहरे भविष्य का बसेरा है।। यहाँ माँ का दरबार है । तो कही छत्तीसगढ़ की शान युवाओ के सपनो का सँसार है।। यहाँ की वादियो में कही नक्सलियों की आहट है। तो कही दोस्ती की अनोखी मिसाल है।। यहाँ चक्रधर राजा की अनोखा घराना है। तो यहाँ अभी युवाओ का जमाना है।। यहाँ कुदरत की अनुरूप छठा है। तो काले हिरे से रायगढ़ पटा है।। यहाँ विवेकानंद जी का ज्ञान है। तो वही शहीद वीर नारायण सिंह हुए महान है।। कुछ अच्छे तो कुछ महान ऐसा है हमारा छत्तीसगढ़ महान।।
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